तत् त्वम् असि
तिमी त्यही हौ ।
तिमी जे हौ त्यही नै हौ ।
तिमी बाहेक अरू कुनै सत्य छैन ।
तिमी नै सत्य हौ ।
तिमी नै जीवन हौ ।
तिमी नै ईश्वर हौ ।
तिमी नै सुरूवात हौ ।
तिमी नै अन्त्य हौ ।
.
.
.
यही नै अन्तिम सत्य हो ।
छन्दोग्य उपनिषत् (6:8.7)
जटाटवी-गलज्जल-प्रवाह-पावित-स्थले
गलेऽव-लम्ब्य-लम्बितां-भुजङ्ग-तुङ्ग-मालिकाम्
डमड्डमड्डमड्डम-न्निनादव-ड्डमर्वयं
चकार-चण्ड्ताण्डवं-तनोतु-नः शिवः शिवम् .. १..
जटा-कटा-हसं-भ्रम भ्रमन्नि-लिम्प-निर्झरी-
-विलोलवी-चिवल्लरी-विराजमान-मूर्धनि .
धगद्धगद्धग-ज्ज्वल-ल्ललाट-पट्ट-पावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम .. २..
धरा-धरेन्द्र-नंदिनी विलास-बन्धु-बन्धुर
स्फुर-द्दिगन्त-सन्तति प्रमोद-मान-मानसे .
कृपा-कटाक्ष-धोरणी-निरुद्ध-दुर्धरापदि
क्वचि-द्दिगम्बरे-मनो विनोदमेतु वस्तुनि .. ३..
जटा-भुजङ्ग-पिङ्गल-स्फुरत्फणा-मणि प्रभा
कदम्ब-कुङ्कुम-द्रव प्रलिप्त-दिग्व-धूमुखे
मदान्ध-सिन्धुर-स्फुरत्त्व-गुत्तरी-यमे-दुरे
मनो विनोदमद्भुतं-बिभर्तु-भूतभर्तरि .. ४..
सहस्र लोचन प्रभृत्य-शेष-लेख-शेखर
प्रसून-धूलि-धोरणी-विधू-सराङ्घ्रि-पीठभूः
भुजङ्गराज-मालया-निबद्ध-जाटजूटक:
श्रियै-चिराय-जायतां चकोर-बन्धु-शेखरः .. ५..
ललाट-चत्वर-ज्वलद्धनञ्जय-स्फुलिङ्गभा-
निपीत-पञ्च-सायकं-नमन्नि-लिम्प-नायकम्
सुधा-मयूख-लेखया-विराजमान-शेखरं
महाकपालि-सम्पदे-शिरो-जटाल-मस्तुनः .. ६..
कराल-भाल-पट्टिका-धगद्धगद्धग-ज्ज्वल
द्धनञ्ज-याहुतीकृत-प्रचण्डपञ्च-सायके
धरा-धरेन्द्र-नन्दिनी-कुचाग्रचित्र-पत्रक
-प्रकल्प-नैकशिल्पिनि-त्रिलोचने-रतिर्मम … ७..
नवीन-मेघ-मण्डली-निरुद्ध-दुर्धर-स्फुरत्
कुहू-निशी-थिनी-तमः प्रबन्ध-बद्ध-कन्धरः
निलिम्प-निर्झरी-धरस्त-नोतु कृत्ति-सिन्धुरः
कला-निधान-बन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः .. ८..
प्रफुल्ल-नीलपङ्कज-प्रपञ्च-कालिमप्रभा-
-वलम्बि-कण्ठ-कन्दली-रुचिप्रबद्ध-कन्धरम् .
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकछिदं तमंतक-च्छिदं भजे .. ९..
अखर्व सर्व-मङ्ग-लाकला-कदंबमञ्जरी
रस-प्रवाह-माधुरी विजृंभणा-मधुव्रतम् .
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्त-कान्ध-कान्तकं तमन्तकान्तकं भजे .. १०..
जयत्व-दभ्र-विभ्र-म-भ्रमद्भुजङ्ग-मश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रम-स्फुरत्कराल-भाल-हव्यवाट्
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्ग-तुङ्ग-मङ्गल
ध्वनि-क्रम-प्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः .. ११..
दृष-द्विचित्र-तल्पयोर्भुजङ्ग-मौक्ति-कस्रजोर्
-गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्वि-पक्षपक्षयोः .
तृष्णार-विन्द-चक्षुषोः प्रजा-मही-महेन्द्रयोः
समप्रवृतिकः कदा सदाशिवं भजे .. १२..
कदा निलिम्प-निर्झरीनिकुञ्ज-कोटरे वसन्
विमुक्त-दुर्मतिः सदा शिरःस्थ-मञ्जलिं वहन् .
विमुक्त-लोल-लोचनो ललाम-भाललग्नकः
शिवेति मंत्र-मुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् .. १३..
इदम् हि नित्य-मेव-मुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धि-मेति-संततम् .
हरे गुरौ सुभक्ति-माशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् .. १४..
पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः
शंभुपूजनपरं पठति प्रदोषे .
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः .. १५..
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ॥ १ ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकाल कालं कृपालं गुणागार संसारपारं नतोऽहम् ॥ २ ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं मनोभूत कोटिप्रभा श्री शरीरम् ।
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गङ्गा लसद्भालबालेन्दु कण्ठे भुजङ्गा ॥ ३ ॥
चलत्कुण्डलं भ्रू सुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥ ४ ॥
प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं अखण्डं अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूल निर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यम् ॥ ५ ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानन्द संदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥ ६ ॥
न यावत् उमानाथ पादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत् सुखं शान्ति सन्तापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ॥ ७ ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भु तुभ्यम् ।
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ॥ ८ ॥
रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ।
॥ इति श्रीगोस्वामितुलसीदासकृतं श्रीरुद्राष्टकं संपूर्णम् ॥
शिवपंचाक्षरस्तोत्र
नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय .
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय .. १..
Salutations to Shiva, who wears the King of snakes as a
garland, the Three-eyed God, whose body is smeared with
ashes, the great Lord, the eternal and pure One, who wears
the directions as His garment, and who is represented by the
“na ” kAra (term).
मन्दाकिनि-सलिलचन्दन-चर्चिताय
नन्दीश्वर-प्रमथनाथ-महेश्वराय .
मन्दारपुष्प-बहुपुष्प-सुपूजिताय
तस्मै मकाराय नमः शिवाय .. २..
I bow to Shiva, who has been worshipped with water from the
gangA (mandAkini) and annointed with sandalwood paste, the
Lord of nandI, the Lord of the host of goblins and ghosts,
the great Lord, who is worshiped with mandAra and many other
kinds of flowers, and who is represented by the
syllable “ma. ”
शिवाय गौरीवदनाब्ज-वृन्द-
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय .
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय
तस्मै शिकाराय नमः शिवाय .. ३..
Salutations to Shiva, who is all-auspiciousness, Who is the
sun that causes the lotus face of GaurI (PArvatI) to blossom,
Who is the destroyer of the Yajna of daksha, whose throat is
blue (nIlakaNTha), whose flag bears the emblem of the bull,
and who is represented by the syllable “shi. ”
वसिष्ठ-कुम्भोद्भव-गौतमार्यमुनीन्द्र-देवार्चितशेखराय .
चन्द्रार्क-वैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय .. ४..
VasishhTha, agastya, Gautama, and other venerable sages, and
Indra and other Gods have worshipped the head of (Shiva’s
linga). I bow to that Shiva whose three eyes are the moon,
sun and fire, and who is represented by the syllable “va. ”
यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय .
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय .. ५..
Salutations to Shiva, who bears the form of a Yaksha, who
has matted hair on His head, Who bears the pinAka bow
in His hand, the Primeval Lord, the brilliant God,
who is digambara (naked), and who is represented by the
syllable “ya. ”
पंचाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ .
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ..
Anyone who recites this sacred five-syllabled mantra,
(namaH shivAya) near the Shiva (linga), attains the abode
of Shiva and rejoices there with Shiva.
.. इति श्रीमच्छंकराचार्यविरचित शिवपञ्चाक्षर स्तोत्रं समाप्तं ..
- अघोर = the Horrific
- Ahirbudhnya
- Anagha = the Flawless
- Ambikanatha = the Lord of the (mother) Goddess
- अनन्त = the Endless
- Andhakasurasudana
- Anekaatman = the Soul of many, the Multiply present
- Anishvara अनिश्वर
- Apavargaprada
- Ardhanisvara
- Arunah = the Red one (also refers to Sun)
- Asani
- Ashtamurti = the Eight formed
- Asitanga
- Avyagra
- अव्यय = the Unmeasurable
- अजय = the Unconquerable
- Babhlusha = the Bull vehicled
- Bhaganetrabhide = the Remover of the eye of bhaga avyakta
- भगवत = the Lord
- Bhaktavatsala = the Blesser of the devotee
- Bharga
- Bhavah = the Source
- Bhairava = the Terrifying
- Bhasmodhulita vigraha = the One smeared in Ash
- Bhiimah = the Strong
- भुजंगभुषण = the Snake ornated
- भुतेश्वर
- Bhutapati = the Head of elements
- चन्द्रशेखर = with the Moon
- Charuvikrama
- Dakshadhvarahara
- देव = Divine, the Basic element (of world)
- DigaMbara = the Sky cladded
- Durdharsha
- Gangadhra = the Bearer of the Ganga
- Ganesavara = the Lord of Ganas
- Gananatha = the Lord of organised group
- Giridhanva = the Mount bowed
- Giripriya = the Liker of mounts
- Girishantah -the One on the mount
- Girishah = Lord of the mountains
- Giritrah
- Hara
- Haraye
- Harikesha = the Brown haired, the Green (leaves) haired
- Havish
- Hiranyaretase
- Isana = the Lord
- Jagadguru = the Guide of the world
- Jagadvyapin = the Omnipresent in the world
- Jalamukti
- Jatadhara = the Matted haired
- Kaiagnirudra
- कैलाशवासी=the Resident of Kailash
- कालकाल = the Death to death (the Time to deva of time)
- कामरीKamari = the Enemy of lust
- Kapalamalin = with skulls necklage
- कपाली = the One adorned with skull
- Kapardin = the Long (matted) haired
- काशिनाथ
- कठोर
- Kavachin
- Khandaparashu
- Khatvangi = the One with axe
- कृपानिधि= the Grace wealth
- Krittivasa
- क्रोध = Fury
- कुमार = the Boy
- ललाटाक्ष = the Forehead eyed
- लिङ्गराज= the Lord of Linga
- महादेव = the Great God
- महाकाल = the Great Time
- महादेव = the Great deva, the Highly divine, the Great Basic element
- महासदाशिव = the Supreme god
- महत = the Great
- महेश्वर = the Great Lord
- महासेनाजनक = the One gave birth to the great commandor (mahaa sena – subrahmanya)
- महायोगी = the Great Yogi
- मृद = the One who makes joyful
- मृगपाणि = the Animal (Deer) handed
- मृत्युञ्जय = the Winner of Death = Dakshinamurti
- नन्दीश्वर =Lord of Nandi
- नटराज
- Nilagriva = the Black throated
- निलकण्ठ = with blue throat
- निललोहित = the Black throated
- Panchavaktra = the Five faced
- पञ्चमुखि = with five faces = Panchanana
- परशुहस्त = the Axe handed
- पशविमोक्षक = the Liberator of bonds
- पशुपति = the Lord of creatures
- परमेश्वर = the Supreme God
- परमशिव
- परमात्मा = the Supreme soul
- Pinaaki = the One with pinaaka bow
- प्रजापति = the Lord of the people
- Pramathadhipa = the Prime Lord
- Purarataye
- Pushadantabhide
- रोहित = the Red one
- रूद्र the Remover of suffering
- रूरू
- सदाशिव = the Eternal Shiva
- सामप्रीय = Please with saama (veda)
- सहस्राक्ष = the Thousands of eyed
- सहस्रपदे = the Thousands worded (named)
- शम्भु
- शंकर= the Doer of good
- सर्व
- शशीशेखर = the Adorned with Moon
- सात्वीक= the Nice charactered
- सर्वज्ञ= the Omniscient
- Shashvata = the Permanent
- Shipivishta = the One encircled in luminance
- श्वेतकण्ठ= the White throated
- शिव = the Propitius, the Auspicious
- शिवप्रीय
- श्रीकण्ठ
- Shuddhavigraha
- Shulapani = the One with trident
- सोम= the One with Uma (also refers to Moon)
- सोमनाथ= the Lord of the Soma
- सोमसूर्याग्निलोचन = moon, sun and fire eyed
- स्थानु = the Stable
- स्थीर = the Stable
- Sundareshvara
- Suxmatanu = the Cryptic formed
- Svaramaya = Musicful (Full of sound)
- Taraka
- Triambaka = the Three eyed
- त्रिलोकेश्रवर = the God of three worlds
- त्रिलेकेश = the Lord ot three worlds
- त्रिलोचन= with three eyes
- Tripuraantaka = the Terminator of three cities
- उग्र = the Fierce
- उग्रदेव = the Might god
- Upavidin = the Thread wearing
- Vaamadeva
- Vastospati
- Vilohitah = the Admirable (Strange) throated
- Virabhadra a Shiva’s avatar
- Virupaksha = the Strange formed and eyed
- Vishnuvallabha
- Visvanata = the Lord of All
- Visvesvara = the Lord of Varanasi
- Vishveshvara -the God of the world
- Vrishanka
- Vyomakesha = the Widespread haired
- Vrishabharudha = the Bull mounting
- यज्ञमाया
- अम्बा
- अम्बिका
- चण्डिका
- चामुण्डी
- छिन्नामस्ता
- दशभुजा
- देवी महात्म्या
- दुर्गादेवी
- जगधात्री
- जगतगौरी
- जटावेदासी
- काली
- कालरात्री
- कपालिनी
- कराली
- महिशासुरमर्दिनी
- मुक्ताकेसी
- शाकम्बरी
- सिंहवाहिनी
- तारा
- विन्ध्यवासिनी
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके |
शरण्येत्र्यम्बके गौरि नारायणी नमोsस्तुते ||
जयन्ति मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी |
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोsस्तुते ||
जय त्वॅँ देवी चामुन्डे जय भूतार्तिहारिणी |
जय सर्वगते देवी कालरात्री नमोsस्तुते ||
श्रीः
शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजं ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये ।।
अगज्ञानन पद्मार्कं गजाननमहर्निशं ।
अनेकदं तं भक्तानामेकदन्तमुपस्महे ।।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुस्साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ।।
गुरवे सर्व लोकानं भिषज्ञे भवरोगिणां ।
निधये सर्वविद्यानं दक्षिणामूर्तये नमः ।।
अज्ञानन्तर्गहन पतितानात्मविद्योपदेशैः ।
त्रातुं लोकान् भवदवशिखातापपापच्यमानान् ।।
मुक्त्वा मौनं वटविटपिनो मूलतो निःसरन्ती
शंभोर्मूर्तिश्चरति भुवने शंकराचार्यरूपा ।।
ऊं ऊं ऊं उग्रचण्डं चचकितचकितं चंचरा(ला) दुर्गनेत्रं
हूँ हूँ हूंकाररूपं प्रहसितवदनं खङ्गपाशान् धरन्तम्।
दं दं दं दण्डपाणिं डमरुडिमिडिमां डण्डमानं भ्रमन्तं
भ्रं भ्रं भ्रं भ्रान्तनेत्रं जयतु विजयते सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ १॥
घ्रं घ्रं घ्रं घोररूपं घुघुरितघुरितं घर्घरीनादघोषं
हुं हुं हुं हास्यरूपं त्रिभुवनधरितं खेचरं क्षेत्रपालम्।
भ्रूं भ्रूं भ्रूं भूतनाथं सकलजनहितं तस्य देहा (?) पिशाचं
हूँ हूँ हूंकारनादैः सकलभयहरं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ २॥
व्रं व्रं व्रं व्योमघोरं भ्रमति भुवनतः सप्तपातालतालं
क्रं क्रं क्रं कामरूपं धधकितधकितं तस्य हस्ते त्रिशूलम्।
द्रुं द्रुं द्रुं दुर्गरूपं भ्रमति च चरितं तस्य देहस्वरूपं
मं मं मं मन्त्रसिद्धं सकलभयहरं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ३॥
झं झं झंकाररूपं झमति झमझमा झंझमाना समन्तात्
कं कं कंकालधारी धुधुरितधुरितं धुन्धुमारी कुमारी।
धूं धूं धूं धूम्रवर्णा भ्रमति भुवनतः कालपास्त्रिशूलं
तं तं तं तीव्ररूपं मम भयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ४॥
रं रं रं रायरुद्रं रुरुधितरुधितं दीर्घजिह्वाकरालं
पं पं पं प्रेतरूपं समयविजयिनं सुम्भदम्भे निसुम्भे।
संग्रामे प्रीतियाते जयतु विजयते सृष्टिसंहारकारी
ह्रीं ह्रीं ह्रींकारनादे भवभयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ५॥
हूंकारी कालरुपी नरपिशितमुखा सान्द्ररौद्रारजिह्वे
हूँकारी घोरनादे परमशिरशिखा हारती पिङ्गलाक्षे।
पङ्के जाताभिजाते चुरु चुरु चुरुते कामिनी काण्डकण्ठे
कङ्काली कालरात्री भगवति वरदे सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ६॥
ष्ट्रीं ष्ट्रीं ष्ट्रींकारनादे त्रिभुवननमिते घोरघोरातिघोरं
कं कं कं कालरूपं घुघुरितघुरितं घुं घुमा बिन्दुरूपी।
धूं धूं धूं धूम्रवर्णा भ्रमति भुवनतः कालपाशत्रिशूलं
तं तं तं तीव्ररूपं मम भयहरणं सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ७॥
झ्रीं झ्रीं झ्रींकारवृन्दे प्रचरितमहसा वामहस्ते कपालं
खं खं खं खङ्गहस्ते डमरुडिमडिमां मुण्डमालासुशोभाम्।
रुं रुं रुं रुद्रमालाभरणविभूषिता दिर्घजिह्वा कराला
देवि श्री उग्रचण्डी भगवति वरदे सिद्धिचण्डी नमस्ते॥ ८॥
आरुणवर्णसङ्काशा खड्गफेटकबिन्दुका।
कामरूपी महादेवी उग्रचण्डी नमोऽस्तुते॥९॥
श्री चण्डिकादण्डकस्तोत्रं समाप्तम्।
http://www.uwest.edu/sanskritcanon/Stotra/Devanagari/stotra24.html


